ब्लॉग के नए रंग... .ना आयें गर पसंद ....बुरा मत मानियेगा.....खेलते खेलते रंगों से....रंगों में थोडा उलझ सा गया हूँ !..

शनिवार, ११ अक्तूबर २००८

शब्द...

क्यों
सुन नहीं पाते
हम दूसरे के
मन की तरंगो को

क्यों नहीं कर पाते
महसूस
उन भावों को,
उस संगीत को,
नाड़ियों के उस
स्पंदन को,
जो उसके भीतर
है कहीं

क्यों होता है
कि हम शब्दों की
नींव पर
बनाते हैं रिश्ते ?

वो शब्द जो
खोखला कर देते
हैं कभी
ख़ुद इन रिश्तों को|

बिना शब्दों के
अगर समझ लें सब कुछ
जान लें सच
रिश्ते बनेंगे,
बिखरेंगे नहीं

क्यों उन शब्दों को
थामना
जरूरी हो जाता है,
क्यों
भावनाओं को जरूरत है
इस माध्यम की
शब्दों के,
इन शब्दों के सहारे
क्यों चाहते हैं
जड़ तक पहुंचना
जहाँ समझ ही
परे हो जाती है
ख़ुद समझ से

क्यों आख़िर
इन शब्दों के
मायाजाल में,
जिनका अर्थ ख़ुद
नहीं समझ पाते
हम भी,
फंस जाते हैं
हम ख़ुद ही ?

और ये अर्थ
खा जाते हैं
हमको
छलनी हो जाते हैं
वो रिश्ते
जो शुरू हुए थे
बिन शब्दों के,
सिर्फ़ भावनाओ से |



------------ निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

3 टिप्पणियाँ:

vishalmagar रविवार, १२ अक्तूबर २००८ १२:४२:०० AM IST  

बहुत बढ़िया sir,

कभी हमारी फरमाइश पे गौर फरमाना...

"बिना शब्दों के भी अर्थ समझना" इस विषय पे २-४ पंक्तिया जरूर लिखियेगा... :)

dj मंगलवार, १४ अक्तूबर २००८ ७:३६:०० PM IST  

अच्छा है sir .....
"शब्द" के माद्यम से निशब्द भावनाओं का आत्ममंथन

दीपाली शनिवार, १ नवम्बर २००८ ७:३४:०० PM IST  

बहुत अच्छा और सच लिखा है अपने...
पढने के बाद मन कुछ पल मौन रहकर सोच ने को प्रेरित करता है...

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