ब्लॉग के नए रंग... .ना आयें गर पसंद ....बुरा मत मानियेगा.....खेलते खेलते रंगों से....रंगों में थोडा उलझ सा गया हूँ !..

रविवार, १८ जनवरी २००९

चल दिये चल दिये...... ..



चल दिये चल दिये
ख्वाब दिल में लिए,
सूखा सागर तो था
फ़िर भी बहते गए |

ख़ुद पे बस था यकीं
राहें सूनी मिली ,
मंजिलों तक सफर
कुछ कठिन ही सही |

कदम खामोश थे
खुश्क थे रास्ते ,
कोई उम्मीद थी
बढ़ चले आसते |

ये भी सोचा नहीं
राह है किस तरफ़,
हर कदम था पता
चाह थी उस तरफ़ |

कहने को बस यही
कुछ तो मिल जाएगा,
सुनते थे बस वही
तू न कुछ पायेगा |

कुछ मिले ना मिले
मज़िलों का पता ,
होगा बस ये गुमाँ
कर दिया, सोचा था |

रुक के 'गर जो कहीं
पीछे देखा कभी ,
होगा गम तो नही
चाहा बस, किया नहीं |.


--------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

5 टिप्पणियाँ:

sobi रविवार, १८ जनवरी २००९ ९:५६:०० PM IST  

Toooo good ....
this one goes right on top of my favourite list...
way to go :)

Kapish रविवार, १८ जनवरी २००९ १०:२८:०० PM IST  

क्या बात है गुरु !! बहुत खूब !!

हाँ .. वैसे काफ़ी घटनाए बीत चुकी है इस बीच ;).. तो शायद मै समझ सकता हूँ की ये कविता किस मासिक स्थिथि में लिखी गई है ;)

Ankita सोमवार, १९ जनवरी २००९ ११:२६:०० PM IST  

Perfect description of the feelings of a youngster searching for his/her path of life...
No matter wht others think bt v shud keep gng ahead to fulfill our motive...
this is wht i understood 4rm ur lines...

Sangeeta बुधवार, २१ जनवरी २००९ १२:२२:०० PM IST  

एक अच्छा प्रयास किस्सी भी संघर्षरत व्यक्ति की मानसिक sthiti को बताने का,

कविता by निपुण पाण्डेय is licensed under a Creative Commons Attribution-Noncommercial-No Derivative Works 2.5 India License. Based on a work at www.nipunpandey.com. Permissions beyond the scope of this license may be available at www.nipunpandey.com.

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